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Channel: लघुकथा
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रोटी की शक्ल

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उसकी अजीबो-गरीब वेश-भूषा और ऊल-जलूल हरकतों से हर किसी का ध्यान उसी ओर खिंच जाता। कई प्रमाण-पत्रों को फ्रेम करवाकर उसने अपने चारों ओर लटका रखा था। हर आने-जाने वाले को देखकर कहता, ‘‘आपकी कसम! जरा पास आकर देखिए, ये नकली नहीं हैं।’’

            कोई सहानुभूति में दो शब्द कह देता, कोई मुँह फेरकर चल देता तो कोई उसकी बातों में रस लेने लगता। थोड़ी देर चुप रहकर वो  बड़बड़ाने लगता…. ‘‘आग लगा दूँगा इस व्यवस्था को, स्साले चोर-उचक्के के पट्ठे….एक्सपीरियंस क्या बिना सर्विस के हो जाएगा, रब्बिश!’’ फिर वह लोगों की ओर मुखातिब होकर पूछने लगता-‘‘क्यों  साहब! रोटी की शक्ल गोल ही होती है न?’’

            सहसा एक कार उसके पास आकर रुक गईं । उसमें बैठे व्यक्ति ने उसके कान में कुछ कहा तो वह बड़बड़ाता हुआ कार में बैठ गया….‘‘जहाँ मरजी ले चलो…ज्यादा से-ज्यादा मुझे फाँसी पर ही लटकवा दोगे न?’’

            कार में बैठते ही उसने पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

            ‘‘मैं वही व्यवस्था हूँ, जिसे तुम अभी गालियाँ दे रहे थे।’’

            ‘‘मुझे अपने साथ क्यों ले जा रहे हो?’’- युवक एकाएक हड़बड़ा गया।

            ‘‘मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहता हूँ….।”

            वह तो भरा पड़ा था, बात काटता हुआ बोला, ‘‘मैं पिछले….’’

            व्यवस्था ने टोका, ‘‘सुनो, तुम पहले कुछ खा लो!’’

            युवक चुप हो गया, कार एक विशाल होटल में जाकर रुकी। युवक ने भरपेट खाना खाया, तब व्यवस्था ने उसकी पीठ थपथपाकर कहा, ‘‘जेंटलमैंन! अब तुम अपनी बात कह सकते हो…’’

            ‘‘जी, मैं कई वर्षों से बेकार हूँ । मुझे कोई नौकरी दिलवा दे तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी…मेरी योग्यताएँ…’’ वह बोले जा रहा था, मगर वो स्वयं महसूस कर रहा था, जैसे यह आवाज उसकी नहीं थी। उसने देखा-व्यवस्था के चेहरे पर मुस्कान और गहरी होती जा रही थी और उसकी आवाज सहसा ‘योर्स फेथफुल्लि’ की टोन में बोलने  लगी थी।

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