Quantcast
Channel: लघुकथा
Viewing all articles
Browse latest Browse all 2466

नोट और भूख

$
0
0

वो बहुत देर से देख रहा था । सड़क पर लगभग एक साइज के कागज के कुछ टुकड़े पड़े हैं ।  कुछ-कुछ  नोट के आकार के  । घर में राशन खत्‍म हो गया था । पैसे भी खत्‍म । शायद  तीव्र भूख की वजह से उसे भ्रम हो रहा था कि सड़क पर नोट पड़े हैं । वरना कौन मूढ़मति होगा जो सड़क पर नोटों को यूं ही छोड़ देगा । उसके देखते- देखत चार-पांच सरकारी गाडि़या गुजर चुकी थीं । नोट होते, तो कोई भी खीसे में रखकर चम्‍पत  हो गया होता । सुनसान सड़क पर निर्विकार नोट पड़े हुए  थे । हवा चलती तो थोड़ा दायें-बायें खिसक जाते थे ।

वो बैचेन था । कन्फ़र्म  करने के लिए कि नोट हैं या कागज के पुर्जे, वो बार-बार दरवाजे तक जाता और टकटकी लगाये देखने लगता । अब वो इतने साफ दिखाई दे रहे थे कि उन्‍हें वो गिना सकता था । पूरे दस थे । हवा का एक तेज झोंका आया । उन दस में से एक फड़फड़ाता हुआ उसके दरवाजे के पास आ गया । देखा तो नक्‍की हो गया,  वो नोट ही हैं । गांधीजी का चश्‍मा पहने हुए फोटो एकदम क्लिअर दिखाई दे रहा था । बस एक बार थोड़ी तेज हवा चल जाऐ और नोट पलट जाये,  तो पक्‍का उसके पीछे “लाल किला” ही होगा ।  ऊपरवाले ने उसकी सुनी । हवा चली । नोट पलटा । लाल किला दिखा । कनफर्म हो गया “पांच सौ” का नोट है ।

उसके मन में शंका ने जन्‍म लिया, कहीं चूरन छाप नोट तो नहीं ? कोई दिल्‍लगी तो नहीं कर रहा । लॉकडाउन में एवईं टाइम पास के लिए किसी ने खिड़की से फेंक दिए हों, और  चुपके से देख रहा हो कि कौन बेवकूफ बनता  है । भला ऐसे कोई सच्‍ची-मुच्‍ची का नोट काहे को सड़क पर फेंकेगा ? उसे याद आया एक बार सिंह साहब के घर के बाहर कचरे में नोट पड़े हुए मिले थे । हड़कम्‍प मच गया था ।  बाद में पता चला उनके यहां इनकम टेक्‍स की रेड पड़ी थी ।

पर इस समय जठर अग्नि को शांत करना उसकी प्राथमिकता थी  । भूख से बेहाल था परिवार  । सरकारी खाने के पेकेट दो दिन से बंद हैं । डिलिवरी बॉय पॉजिटिव निकला ।  वो सोचने लगा नोट उठा भी लूंगा तो किस काम का ? दूकानें बंद । रास्‍ते बंद । पेट की भूख नोटों से शांत नहीं होनेवाली । उसने फील किया कि उसे माया से “वितृष्‍णा” होने लगी ।

“बापू भूख लगी है..” उसका  बेटा दरवाजे के पास आकर बोला । बेटे की नजर नोट पर पड़ी। । वो लपका । चीखा । बापू देखो ये क्‍या है । नोट बेटे के हाथ में था । सामने पुलिस चौकी पर पुलिसवाला जो अभी तक पीठ करके बैठा था, पलटा । सड़क पर बिखरे नोट देखते ही पुलिसवाला हरकत में आ गया । हाथों में दस्‍ताने पहने  वो एक-एक नोट को बड़े जतन से उठाने लगा । मानो लेंडमाइन के बमों का डिफ्यूज कर रहा हो ।  उसने बेटे से संभावित कोरोना संक्रमित नोट लेकर पन्‍नी में रख लिया । पुलिसवाला कड़क आवाज में स्‍लोगन बोला  – “घर में रहो । सुरक्षित रहो ।” घर में  भूख और पैसे के बीच संघर्ष जारी था ।

-0–: सुनील सक्‍सेना, 301  सागर रेसीडेंस,ई 6/93 अरेरा कॉलोनी


Viewing all articles
Browse latest Browse all 2466

Trending Articles



<script src="https://jsc.adskeeper.com/r/s/rssing.com.1596347.js" async> </script>